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Thu, 24 Jul 2008 13:26:00

क्या स्वयं भगवान राम ने रामसेतु को नष्ट किया था?

मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आर वी रवीन्द्रन तथा न्यायमूर्ति जे.एम पांचाल की पीठ ने सुझाव दिया कि सरकार को आस्था और समुद्री पर्यावरण की रक्षा के बीच संतुलन बिठाना चाहिए
रामसेतु

उच्चतम न्यायालय ने सेतु समुद्रम परियोजना के वैज्ञानिक और राजनीतिक दृष्टि से संभव समाधान ढूंढे जाने की कोशिश करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आर वी रवीन्द्रन तथा न्यायमूर्ति जे.एम पांचाल की पीठ ने सुझाव दिया कि सरकार को आस्था और समुद्री पर्यावरण की रक्षा के बीच संतुलन बिठाना चाहिए। न्यायालय में केन्द्र की पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता फाली एस नरीमन ने बताया कि सरकार कोई सेतु नष्ट नहीं कर रही और इस परियोजना में खासी सावधानी बरती जा रही है। उन्होंने कम्ब रामायण और पद्म पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वयं भगवान राम ने रामसेतु को नष्ट कर दिया था ताकि कोई लंका से इस ओर न आ सके।उनकी दलील थी कि यदि आप आस्था पर भरोसा कर रहे हैं तो आपको अन्य आस्थाओं का भी ध्यान रखना होगा। सरकार हिंदुओं की भावनाओं से खेल रही है।उनका कहना था कि इसके पहले सरकार ने एक हलफ़नामा देकर भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था।

दरअसल करुणानिधि की पार्टी डीएमके यानी द्रविड़ मुनेत्र कझगम इस परियोजना को आगे बढ़ाना चाहती है । इसी साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को दो अहम निर्देश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि भारतीय पुरातात्विक विभाग (एएसआई) को यह जाँच करनी चाहिए कि क्या रामसेतु को 'प्राचीन स्मारक' घोषित किया जा सकता है?   और दूसरा यह कि केंद्र सरकार को इस परियोजना के लिए वैकल्पिक रास्ते या नए 'एलाइनमेंट' की तलाश करनी चाहिए।

दरअसल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हलफ़नामे में कहा था कि 'राम-सेतु' के ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेष होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। इसके बाद कई हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था और इस पर राजनीतिक हंगामा भी हुआ था।

क्या है सेतुसमुद्रम परियोजना?

सेतुसमुद्रम भारत और श्रीलंका के बीच तैयार होने वाली परियोजना है जिसके तहत वहाँ के उथले समुद्र को गहरा करके जहाज़ों के आने-जाने का रास्ता साफ़ करना है। इसके तहत उस संरचना को भी तोड़ा जाना है जो हवाई चित्रों में पुल की तरह दिखाई देता है। हिंदू संगठनों का कहना है कि यह 'राम-सेतु' है जिसका ज़िक्र रामायण में है।

दरअसल भारत के पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक जाने के लिए एक जहाज़ को श्रीलंका के पीछे से चक्कर लगाकर जाना पड़ता है क्योंकि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र काफ़ी उथला है।  जहाज़ों को इस यात्रा में तक़रीबन 424 समुद्री मील यानी क़रीब 780 किलोमीटर की अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है। इसमें 30 घंटे ज़्यादा खर्च हो जाते हैं।

लेकिन सेतुसमुद्रम परियोजना को सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिल जाने के बाद क़रीब 89 किलोमीटर लंबे दो चैनल बनाए जाएँगे। ये दोनों चैनल एक चौड़ी नहर की तरह होंगे जिससे होकर बड़े-बड़े जहाज़ आ-जा सकेंगे। एक चैनल उस एलाइनमेंट या रास्ते पर बनाया जाएगा जिसे 'रामसेतु' या एडम्स ब्रिज माना जाता है। जबकि दूसरा चैनल दक्षिण पूर्वी पामबान द्वीप के रास्ते पर पाक जलडमरू मध्य को गहरा करके बनाया जाएगा।

 


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