दिनांक २० जुलाई के समाचार पत्रों में यह समाचार प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है कि पोप महोदय ने कैथोलिक पादरियों द्वारा काफी समय से किये जा रहे यौन अपराधों के लिए सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगी है। इतना ही नहीं, उन्होंने ऐसे लोगों को कानून के अनुसार दंड देने का भी समर्थन किया है। उनका यह कदम सराहनीय है।
वस्तुत: यह प्रश्न पिछले काफी समय से चर्चा में है। भारतीय समाचार पत्रों में तो कम; पर ईसाई देशों के पत्रों में पादरियों के दुराचरण की घटनाएं सुर्खियों में छपने लगी हैं। वहां इनके विरुद्ध हर दिन मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। पादरियों तथा उनके संरक्षक चर्च को करोड़ों ड१लर हर्जाने के रूप में देने पड़ रहे हैं। कहीं-कहीं चर्च स्वयं आगे बढ़कर समझौता कर रहा है। यह स्थिति निश्चित ही निन्दनीय एवं चिन्ताजनक है। भारत में ईसाई बहुत कम हैं; पर धीरे-धीरे यहां भी ऐसे पादरियों की संख्या बढ़ रही है।
प्रश्न है कि पादरियों में यह रोग कैसे आया ? ईसाई मान्यता के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति जन्मजात पापी है। उसको पापों से मुक्ति दिलाने के लिए ईसा मसीह अपने जन्म से पहले और बाद के सभी लोगों के पाप अपने सिर लेकर सूली पर चढ़ गये। इसलिए अब किसी को पाप से विरत रहने की आवश्यकता नहीं है। बस उन्हें इतना मात्र करना है कि वे अपने पाप को पादरी के सम्मुख स्वीकार (कन्फैस) कर लें। इसलिए पादरी के सम्मुख व्यक्ति अपने मन के सारे कलुष खुलकर बता देता है। इनमें बड़ों के अलावा छोटे बच्चे, युवक एवं युवतियां भी होती हैं। वर्तमान ईसाई देशों में आधुनिकता के नाम पर जैसा स्वछंद यौनाचार प्रचलित है, उसके कारण बड़ी संख्या में ऐसे लोग पादरी के सम्मुख आकर अपनी बात कहते हैं। यह प्रक्रिया सामान्य व्यक्ति को तो कुछ राहत देती है; पर अनेक पादरी इससे स्वयं पाप पंक में पहुंच जाते हैं।
प्राय: प्रत्येक चर्च के साथ कोई विद्यालय एवं छात्रावास भी होता है, जिसके प्रधानाचार्य एवं छात्रावास प्रमुख का दायित्व भी कई बार पादरी ही निभाते हैंं। भारत जैसे देशों में ऐसे छात्रावासों में निर्धन एवं धर्मान्तरित अभिभावकों के बच्चों को रखकर पढ़ाया जाता है। इनमें से ही अनेक बच्चे आगे चलकर पादरी, नन तथा ईसाई धर्म प्रचारक बनते हैं। छोटे बच्चों और किशोरों के बीच में अविवाहित पादरी के रहने से दुर्घटना होने का खतरा बना रहता है। ध्यान रहे कि भारत में जो प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था थी, उसमें भी छात्र अपने घर से दूर रहकर शिक्षा पाता था; पर उन गुरुकुलों के प्रमुख सपत्नीक वहां रहते थे। गुरुकुल के अधिष्ठाता को स्वाभाविक रूप से सब कुलगुरु तथा उनकी पत्नी को गुरुमाता कहते थे; पर पादरियों के लिए आजीवन अविवाहित रहना अनिवार्य है। एक बार पादरी या नन बनने के बाद फिर पीछे नहीं मुड़ा जा सकता।
हर जीव में एक निश्चित अवस्था या समय पर विपरीत लिंगी (सैक्स) के प्रति यौनाकर्षण उत्पन्न होता है। यह मर्यादाहीन न हो, इसके लिए विश्व के प्रत्येक सभ्य समाज ने विवाह नामक संस्था को मान्यता दी। इससे जहां एक ओर सृष्टि का अस्तित्व बना रहा, वहां समाज उच्छृंखलता से भी बच गया; पर इसके साथ ही कुछ ऐसे लोगों ने अविवाहित रहने का निश्चय किया, जिन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य स्व से ऊपर उठकर समाजहित को माना। भारतीय व्यवस्था ने इन्हें संन्यासी के रूप में मान्यता दी। समाज ने इनकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति (योगक्षेम) का प्रबन्ध अपने ऊपर लिया, जिससे ये लोग स्वतंत्रतापूर्वक ईश्वर की आराधना या समाजहित के इच्छित कार्य में अपना पूरा समय लगा सकें। प्राय: ऐसे संन्यासी मठ, मंदिरों या आश्रमों में रहते हैंं।
पर इसके साथ भारतीय मनीषा ने यह व्यवस्था भी की कि ऐसे पुरुष तथा महिलाएं अलग-अलग रहें। आज भी धार्मिक स्थलों तथा तीर्थस्थानों पर अनेक ऐसे मंदिर, आश्रम या धर्मशालाएं मिलती हैं, जहां केवल महिलाओं के रहने की व्यवस्था है। यद्यपि ऐसे लोगों में अधिसंख्य पुरुष होने के कारण उनके रहने के लिए बने संस्थान तो प्राय: हर स्थान पर मिल जाते हैं। भारत में जब बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ, तब राज्याश्रय पाकर उसका केवल भारत की नहीं, तो चीन, जापान, श्रीलंका, बर्मा, भूटान आदि निकटवर्ती देशों में भी विस्तार हुआ। सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा से प्रेरित होकर बड़ी संख्या में युवकऱ्युवतियां 'बुद्धं शरणं गच्छामि` कहकर बौद्ध संघ में सम्मिलित हो गये। ऐसे सब भिक्षु और भिक्षुणियों के रहने की व्यवस्था एक ही मठ में की गयी।
लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ ? प्राय: ऐसे सभी स्थान भ्रष्ट आचरण के केन्द्र बन गये। अंतत: समाज में इनका प्रबल विरोध खड़ा हो गया और जब आद्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा का आंदोलन प्रारम्भ किया, तो सम्पूर्ण भारत में उसे व्यापक समर्थन मिला। लोगों ने इन बौद्ध मठ-मंदिरों के प्रभाव से स्वयं को मुक्त कर लिया। कालान्तर में शंकराचार्य महाराज ने संन्यासियों की दशनामी परम्परा प्रारम्भ की, जिनका उद्देश्य देश, धर्म और धर्मग्रन्थों की रक्षा के लिए अपना पूरा समय लगाना था। तत्कालीन समाज और शासक वर्ग ने इन संन्यासियों के रहने के लिए नगरों से दूर विशाल मठ, किले तथा छावनियां बनायीं। साथ ही इनके भोजन, वस्त्रादि के उचित प्रबन्ध किये। ये सब संन्यासी निश्चिंत होकर अपना पूरा समय शस्त्राभ्यास या शास्त्रों के अध्ययन में लगाते थे। स्वाभाविक रूप से ये सब संन्यासी अविवाहित ही रहते थे।
गत शताब्दी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा० केशव बलिराम हेडगेवार ने प्रचारक प्रणाली के रूप में इस व्यवस्था को एक नया रूप दिया। वे स्वयं अविवाहित रहे तथा उनकी प्रेरणा से ही आज संघ के पास जीवनव्रती प्रचारकों की एक बड़ी टोली है, जो संघ की कार्यवृद्धि का एक प्रमुख आधार है। संघ के प्रचारक भी अविवाहित ही रहते हैंं। उनके आवास की व्यवस्था प्राय: संघ कार्यालय पर या प्रवास के समय स्थानीय कार्यकर्ताओं के घरों पर होती है। वे भोजन भी स्थानीय स्वयंसेवक परिवारों में ही करते हैं। बड़ी संख्या में युवक अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद दो-तीन वर्ष का समय संघ के लिए देते हैं। संघऱ्योजना से उन्हें विभिन्न स्थानों पर भेजा जाता है। इन प्रचारक कार्यकर्ताओं के योगक्षेम की व्यवस्था भी संघ के स्वयंसेवक एवं संघप्रेमी लोग ही करते हैं।
पर डा० हेडगेवार ने इसमें जो नया आयाम जोड़ा, वह यह कि उन्होंने किसी को आजीवन प्रचारक बने रहने को बाध्य नहीं किया। जैसे युवक स्वेच्छा से प्रचारक के रूप में समय देने के लिए आगे आते हैं, उसी प्रकार वे समय पूर्ण होने पर नौकरी, व्यापार, खेतीबाड़ी आदि के साथ गृहस्थाश्रम भी अपना लेते हैं। अब वे स्थानीय कार्यकर्ता के रूप में संघ-कार्य करते हैं। इनमें से एक-दो प्रतिशत लोग ऐसे भी होते हैं, जो पूरा जीवन ही प्रचारक के रूप में समर्पित कर देते हैं। फिर भी उन पर प्रचारक बने रहने की कोई बाध्यता नही होती। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जब १५-२० वर्ष प्रचारक रहने के बाद भी कार्यकर्ताओं ने गृहस्थाश्रम स्वीकार किया है। डा० हेडगेवार द्वारा डाली गयी इस परिपाटी के कारण संघ उन सब समस्याओं से मुक्त है, जो आज ईसाई पादरियों के गले की फांस बन गयी हैं।
संघ के कार्य से प्रभावित होकर जब महिलाओं में ऐसा संगठन स्थापित करने की बात कुछ जागरूक महिलाओं के मन में आयी, तो उन्होंने डा० हेडगेवार से सम्पर्क किया। इस प्रकार १९३६ में 'राष्ट्र सेविका समिति` का जन्म हुआ। एक बार समिति की संस्थापिका श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर ने संघ और समिति के बीच संबंध की बात पूछी, तो डा० जी ने स्पष्ट उत्तर दिया कि दोनों संगठन रेल की उस पटरी की तरह साथ-साथ चलेंगे, जो सदा निकट तो रहती हैं; पर कभी आपस में मिलती नहीं। स्वाभाविक रूप से आज भी दोनों संगठन अपने-अपने क्षेत्र में सफलता से कार्यरत हैं। परस्पर सहायता एवं परामर्श तो दोनों करते हैं; पर उनके कार्यक्रम, शिविर, कार्यालय आदि अलग-अलग रहते हैं।
अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए सभी धर्मों ने कुछ न कुछ व्यवस्था बनायी है; पर ईसाई समाज में धर्म प्रचारकों के लिए अविवाहित रहने की बाध्यता उचित नहीं है। इसी कारण सम्पूर्ण पादरी समाज संदेह के घेरे में आ गया है। परिणामस्वरूप ईसाई देशों में चर्च जाने वालों की संख्या में अत्यधिक गिरावट आयी है तथा लोगों में इस व्यवस्था के प्रति विद्रोह पनप रहा है। इसलिए ईसाई समाज को यथाशीघ्र इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।