अगर तालिबान का प्रभाव बढ़ता है तो जम्मू-कश्मीर की शांति भंग होने में देर नहीं लगेगी। ये बातें भारत में अमेरिका के राजदूत रहे फ्रैंक जी. वाइजनर ने कही हैं। वे आईआईटी मुंबई की गोल्डन जुबली कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे। इस मौके पर संस्थान के 800 पूर्व छात्र भी मौजूद थे।
वाइनरज के मुताबिक भले ही जम्मू-कश्मीर का मसला दोनों देश कभी नहीं सुलझा पाए लेकिन शांति के रूप में हनीमून की स्थिति कई साल से बनी हुई है। पर अब जबकि पाकिस्तान में पीपीपी नेता आसिफ अली जरदारी और पीएमएल-एन प्रमुख नवाज शरीफ के बीच उभरे मतभेदों से कानून व्यवस्था की हालत बिगड़ गई है तो इससे तालिबान का प्रभाव बढ़ेगा, जिससे जम्मू-कश्मीर के लिए समस्या खड़ी हो सकती है। शरीफ की पार्टी का पीपीपी से मतभेद मूलत: बर्खास्त जजों की बहाली के मसले पर है। सरकार ने जजों की बहाली के लिए खुद से दो डेडलाइन तय की थी लेकिन वह उन्हीं पर खरी नहीं उतर पाई। इस कारण नवाज की पार्टी ने मई में अपने नौ मंत्री पीपीपी नीत कैबिनेट से वापस बुला लिए थे।
इसी तरह जहां पाकिस्तान में कानून व्यवस्था की स्थिति गड़बड़ाई हुई है वहीं जम्मू-कश्मीर में भी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे के बाद से राजनीतिक अनिश्चितता की स्थिति है। अपने 40 मिनट के भाषण में वाइजनर ने कई मसलों को उठाया। उन्होंने दोहा दौर की व्यापार वार्ता के भी सफलतापूर्वक पूरा होने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने माना कि औद्योगिक देशों द्वारा कृषि रियायतों और विकासशील देशों द्वारा अपने बाजार खोलने जैसे मसले विवादास्पद हैं। ऐसे में इस वार्ता की सफलता के लिए भारत और अमेरिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसी से गरीब और अमीर दोनों देशों के हित साधे जा सकेंगे।
उन्होंने मुक्त व्यापार की हिमायत तो की पर यह भी माना कि इसका नौकरी बजार पर खासा प्रभाव पड़ेगा। अच्छा होगा कि मुक्त व्यापार का समर्थन करने वाले ही इसके विभिन्न पक्षों और प्रभावों पर विचार कर इसके समाधान खोजें।