केंद्र सरकार ने गुजरात हाई कोर्ट से कहा कि हम मोदी सरकार के आतंकवाद निरोधी कानून को मंजूरी देने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि यह रद्द किए जा चुके पोटा की तरह का कानून है। अदालत ने गैरसरकारी संस्था 'जस्टिस ऑन ट्रायल' की याचिका पर केंद्रीय गृह मंत्रालय से जवाब देने को कहा था। यह याचिका 'गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक' (गुजकोक) को मंजूरी देने में हो रही देरी को लेकर दाखिल की गई थी। गौरतलब है कि यह विधेयक राष्ट्रपति के पास पिछले चार साल से पेंडिंग है।
अदालत के समक्ष दाखिल हलफनामे में मंत्रालय ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर कार्यपालिका राज्य विधायिका के उस तरह के विधेयक को पारित करने की सिफारिश नहीं कर सकती, अगर उसी प्रकृति के कानून को केंद्रीय विधायिका ने निरस्त कर दिया है। हलफनामे में यह भी कहा गया कि विस्तृत परीक्षण में यह निष्कर्ष निकला कि यह केंद्र सरकार की नीति के अनुरूप नहीं होगा कि किसी ऐसे विधेयक को पारित करने की सिफारिश की जाए जिसके प्रावधान पहले ही निरस्त किए जा चुके पोटा की तरह हैं। हलफनामे में कहा गया है कि राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंत्रिमंडल के विचार के लिए सौंपा गया है। उम्मीद की जाती है कि इस पर निकट भविष्य में फैसला किया जाएगा।
चीफ जस्टिस के. एस. राधाकृष्णन और जस्टिस एम. एस. शाह ने केंद्र सरकार के वकील हरीन रावल के हलफनामे के संबंध में दलीलों को सुनने के बाद अगली सुनवाई की तारीख एक महीने के बाद निर्धारित की। गुजकोक पर अपनी याचिका में एनजीओ ने पूछा था कि राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा पारित किसी विधेयक को किसी पार्टी की राजनैतिक विचारधारा के आधार पर कैसे रोका जा सकता है? याचिका में कहा गया कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में इस तरह का कानून है लेकिन यूपीए सरकार ने इस तरह के कानून को गुजरात में लागू करने की मंजूरी नहीं दी है।