एक सैनिक तानाशाह जो पिछले नौ सालो से पाकिस्तान पर राज कर रहा था। एक बात तो साबित कर ही दी कि उसको वक्त की परख है। वक्त की पारखी होने की वजह से इस साल के शुरुआती महीनो मे उसका सैनिक राष्ट्रपति से नागरिक राष्ट्रपति बनना और अब राष्ट्रपति पद से इस्तीफ का ऐलान इस बात का परिचायक है। देश मे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मे आये बदलाओ की वजह से नेताओ के विचारो मे भी परिपक्वता आई है। इस बदलाओ की वजह से ही मुशरर्फ के विरुद्ध महाभियोग लाने का फैसला हुआ जो पकिस्तान के पिछले इतिहास को देखते हुए यह राजनीतिक दलो का साहस भरा फैसला था।
पाकिस्तान के दो प्रमुख दल जो सरकार मे शामिल है ने जब महाभियोग लाने का फैसला लिया, उसके बाद पाकिस्तान के प्रांतीय विधान सभाओ ने प्रस्ताव भी पास करना शुरु कर दिया कि मुशर्रफ पद से हटे नही तो उनको महाभियोग लगाकर हटाया जाएगा। इसके बाद मुशर्रफ के पास दो रास्ते थे । पहला संसद मे इतने सदस्यो का जुगाड करे जिससे उन पर महाभियोग का मुकदमा न चले। लेकिन पीपीपी और पीएम (एन) की एकता उनको ऐसा करने से रोक रही थी, साथ ही साथ उनके खुद के दल के सदस्य उनको छोड कर जा रहे थे। छोटे दल भी पाला बदलने लगे थे। इस तरह देखा जाए तो उनका पहला रस्ता तो विल्कुल बन्द हो गया। दूसरा रस्ता उनके पुराने संस्था की तरफ जाता यानि सैनिक शासन। यानि सेना पुन चुनी हुई सरकार को बरखास्त करने मे उनकी मदद करे और देश मे सैनिक शासन की लागू हो। लेकिन उनके पुराने साथियो ने उनका साथ देने से इंकार कर दिया । वजह जनता का जबरदस्त दबाव इसके लिए वहा की जनता बधाई की पात्र है।
अब मुशर्रफ के पास इस्तीफा देने के अलावा कोई रास्ता नही बचा था मुशर्रफ ने वैसा ही किया। तनाशाह की विदाई को देखे तो बडे ही समांजनक से हुई है। इसके लिए जरदारी और नबाज शरीफ बधाई के पात्र है। मुशर्रफ ने अपने बिदाई भाषण मे अपने कार्यकाल के तारीफ के पुल बान्ध दिए। 9 सालो के शासन मे जितने भी अच्छे कार्य हुए वह उन्ही के वजह से हुआ ऐसा उनका मानना और कहना था। इसका श्रेय लेने को बेताब नजर आये । यह सही है कि अन्य सैन्य शासको की तुलना मे मुशर्रफ के कार्यकाल मे पाकिस्तान मे तरक्की हुई, पर इसकी कीमत देश के संवैधानिक संस्थाओ को चुकानी पडी । मुशर्रफ का शिकार खास तौर पर न्यायपालिका और चुनाव आयोग हुई क्योकि इन संस्थाओ के माध्यम से वे अपना उल्लू सीधा करते थे। नई सरकार के बनने के बाद उसके काम करने मे सबसे बडी बाधा खुद मुशर्रफ थे। सरकार कोई भी कदम उटाना चाहती थी तो उसके बीच मे मुशर्रफ रुपी पहाड खडा हो जाता था। उनके जाने का बाद पाक तरक्की के रास्ते पर तेजी से अग्रसर होगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मुशर्रफ के कार्यकाल को समय के बरबादी और उनके द्वारा वादा खिलाफी के रुप मे याद रखेगा। मुशर्रफ जब सत्ता मे आये थे तब वे आधुनिकरण और समाज मे कट्टरपंथियो से लडने की बात किया करते थे। इस्लाम मे उदारपंथियो को प्रोत्साहन देने की बात करने वाला शख्स अपने कार्यकाल के अंतिम सालो मे चरमपंथियो के आगे घुटने टेक देगा। दहशतगर्दी से लडने की वकालत करने वाला दहशतगर्दी करने वाला का मित्र बन जायेगा। किसी ने भी ऐसा नही सोचा था कि मुशर्रफ ऐसा निकलेगा?
भारत इस बात से इन्कार नही कर सकता कि मुशर्रफ के शासन के दौरान भारत पाक सम्बन्धो मे स्थायित्वपन आया है। यदि कारगिल के युद्ध को छोड दिया जाय तो। कारगिल से सबक लेने के बाद मुशर्रफ रिश्तो मे मिटास घोलने का प्रयास किया अब जब मुशर्रफ का राजनीतिक पटल से विदाई हो गई है, तो जरुरत है कि भारत –पाक रिश्तो को और मजबूत करने की । लेकिन इसके लिए नये शासको आतंकवाद रुपी दानव पर काबु पाने के लिए भारत को दिल से मदद करने की जरुरत होगी अन्यथा ये दानव पाकिस्तान को एक दिन निगल जायेगा, भारत की भी कमर टुट जायेगी उसके बाद खडे होने मे काफी वक्त लगेगा।