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Mon, 18 Aug 2008 15:08:00

प्रचंड का प्रधानमंत्री बनना

सबकी नजर नेपाल के विदेश नीति पर भी होगी। चीन के प्रति प्रचंड का रवैया कैसा रहता है। प्रचंड का भारत के प्रति अब तक के बयानो को ध्यान में रखते हुए यह गौर करने वाली बात होगी भारत के प्रति उनका दृष्टिकोण कैसा रहता है
प्रधानमंत्री के रूप में माओवादी प्रचंड

संविधान सभा में बहुमत द्वारा दो सौ चालीस साल का राजतंत्र समाप्त करके देश में संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषणा करने के बाद सही मायने में स्थायी सरकार नहीं था। तीन दल का नया गठबंध सीपीएम मावोवादी, सीपीएम-यूएमएल और मधेस जनाधिकार फोरम के नेताओं के बीच मंत्रीमंडल का गठन और साझा न्यूनतम कार्यक्रम के बारे में  निर्णय लिया तब जाकर नेपाल सरकार का मुह देख पाया। 

संविधान सभा के तीन चौथाई से ज्यादा सदस्यों द्वारा नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में माओवादी प्रचंड का चुनाव देर से लिया गया  सही निर्णय लगता है। आम चुनाव के बाद संविधान सभा के 40 प्रतिशत सीट जीत कर और सहसे बड़ी राजनीतिक दल के रूप में उभरने के बाद माओवादी का यह नैसर्गिक जनतांत्रिक हक बनता था कि वह देश का नेतृत्व करे साथ ही साथ जनता द्वारा पूर्ण बहुमत नही देने की वजह से माओवादी जनता के इच्छानुसार गठबंधन की सरकार बनाये पिछले दो वर्षो से चल रहे सर्वदलीय सरकार की वजह से यह बात तो साफ है कि नेपाल जो हाल ही में गणतंत्र बना है सरकार बना भी सकता है और चला भी सकता है।

सरकार में देरी की प्रमुख वजह नेपाली कांग्रेस के 83 वर्षीय और चार बार प्रधानमंत्री बने गिरिजा प्रसाद कोइराला के द्वारा माओवादियो को सत्ता मे आने से रोकना , लेकिन कोईराला का और दलो का समर्थन नही मिला। जनता का दबाव साथ ही साथी दलो का इस बात का एहसास की माओवादी को यदि सत्ता नही मिली तो वे पुन हिंसा के रास्ते पर न लौट जाये। साथ ही प्रचंड के विचारो मे आया लचीलापन। इन सब कारणो की वजह से नेपाल मे सरकार का निर्माण हो पाया जिसके मुखिया प्रचंड होगे।   

माओवादियों के नेतृत्व में सरकार अगले चुनाव तक सत्ता में रहे इसकी भी सरकार में शामिल दलों में कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ नेपाल, मधेशी, जनाधिकार फोरम के बीच सत्ता का समझौता हुआ है। सत्ता के समझौते के अनुसार माओवादी खुद अपने पास, रक्षा और वित्त, मार्क्सवादी नेपाली के पास, गृह और विदेश और मधेशी जनाधिकार फोरम के पास भी कुछ महत्वपूर्ण विभाग होगें। माओवादियों ने अपने युवा कम्युनिष्ट लीग को भंगकर दिया है। अपने पीपुल्स लिबरशेन आर्मी को पारदर्शी तरीके से नेपाल के सेना में शामिल होने के योजना की घोषणा की है।

पूरे विश्व में जिसे तरह से आर्थिक अनिश्चिता का महौल है उसमें नेपाल के नये प्रधानमंत्री प्रचंड की भूमिका देखने लायक होगी। सबकी नजर नेपाल के विदेश नीति पर भी होगी। चीन के प्रति प्रचंड का रवैया कैसा रहता है। प्रचंड का भारत के प्रति अब तक के बयानो को ध्यान में रखते हुए यह गौर करने वाली बात होगी भारत के प्रति उनका दृष्टिकोण कैसा रहता  है। वैसे शांत और समृद्ध नेपाल भारत के हित में है। भारत को भी नई सरकार से सहयोग करने के लिए तत्पर रहनी चाहिए। यदि वहां की सरकार चाहती है तो?

 


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